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समय का आईना

समय का आईना

मुंबई का डॉन नहीं लेकिन अपने शहर का राजा तो मैं था ही। अपने शहर का जाना माना उद्योगपति आमोद कुमार लेकिन मेरे द्वारा स्थापित यह विराट साम्राज्य मेरी खून पसीने की कमाई का नतीजा था। भ्रष्ट नहीं था मैं। जंगल का बब्बर शेर था लेकिन किसी असहाय जानवर का शिकार कभी नहीं किया। मैंने हमेशा सबकी भरसक मदद की। कभी कोई मेरे दर से खाली हाथ नहीं लौटा।
मेरा इकलौता बेटा था मयंक। बड़ी उम्मीदें थी उससे कि बड़ा होने पर वो मेरे व्यवसाय को और मुझे दोनों को ही सम्भाल लेगा। वक्त कैसे करवटें लेता तेजी से बीत जाता है पता ही नहीं पड़ता। अपनी जवानी के दिनों में गुर्राता एक शेर सा मैं धीरे धीरे क्षीण हो रहा था। मयंक ने अपनी पसंद की लड़की से शादी करी। हमारे साथ नहीं रहता था। अलग अपने परिवार के साथ रहता था।
बीमारियों ने मुझे कब जकड़ लिया पता ही नहीं पड़ा। एक दुर्भाग्यपूर्ण समय ऐसा भी आया कि मैं एक अपाहिज की तरह बिस्तर पे ही पड़ गया। बेटे को व्यवसाय और समाज से, बहू को अपने परिवार और निजी लाइफ से और पोते-पोतियों को खेलकूद, स्कूल और पढ़ाई से फुरसत ही नहीं मिलती थी। सबके लिये उनके पास समय था पर बूढ़े, बीमार और लाचार बाप के लिए नहीं।
सोचता हूँ परवरिश में कहाँ कमी रह गई। आजकल के बच्चे संस्कारी नहीं रहे या इनका दिल अपनों के लिए नहीं धड़कता। परायों के लिए तो धड़कता है या यह सब कृत्य वो सोशल इमेज बिल्डिंग के नाम पर करते हैं, यहाँ तक की अपनी जान पे खेलने को भी तैय्यार हो जाते हैं। मरने की कगार पे मेरे कदम पल पल बढ़ रहे थे। समय के आईने में खुद को निहार रहा था कि क्या मैंने सारी उम्र जो इतनी घास खोदी, मेहनत करी, पसीना बहाया इस आशा के साथ कि मेरे बच्चे पढ़ लिखकर लायक बने। मेरे व समाज की तरक्की में सहयोग दें। मेरी कुर्बानियों का मुझे यह सिला मिला। मैं गधा हूँ। हाँ, सचमुच का गधा हूँ जो यह आजकल के बच्चे मुझे गधा समझते हैं, गधा समझ ही व्यवहार करते हैं और तो और आसानी से जब चाहा आंखों में धूल झोंककर अपना उल्लू सीधा करने के लिये गधा बना लेते हैं। शहर में एक बब्बर शेर सी हस्ती और घर में एक शेर सी तूती बोलती थी मेरी। सब मिट्टी में मिला दिया। आजकल के बच्चों ने तो अपने माँ बाप की इज्जत की धज्जियां उड़ाकर उन्हें कहीं का न छोड़ा बस गधा बना दिया। न बब्बर शेर, न शेर, न हीरो, न डॉन, सिर्फ गधा। सब सपनों को धराशायी करता, अपने निर्बल कन्धों पर अपने ही बच्चों की गद्दारी का बोझ ढोता, इस दुनिया को अलविदा कहता एक दुखियारा मरापिटा बाप – अरे हाँ बाप कहाँ, कोई इंसान नहीं, सिर्फ और सिर्फ एक गधा, मात्र एक जानवर।

मीनल

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