– मीनल

सर्दी की ढिढुरती ठंड और कमबख्त उस पर सुबह सुबह फोन की घंटी। जैसे तैसे रजाई से निकलकर शॉल लपेट जल्दी से मैं फोन की तरफ लपकी। उठाया तो जानी पहचानी सी आवाज लगी। अंदाजा ठीक ही निकला। अपनी कमला बहिन का फोन था। पहचानना पलभर को मुश्किल यूं लगा कि फोन उठाते ही उन्होंने सुबक सुबक कर आसूंओं की गंगा जो उमड़ा दी थी। मुझे तो वह हमदर्दी तक जताने का मौका नहीं दे रही थी। कुछ देर तक तो यूं ही आंसू टपकते रहे फिर रेडियो ऑन। सारी व्यथा एक ही सांस में कह डाली। उनपर तो जैसे बिजली ही गिर पड़ी थी। लेकिन मेरी हंसी थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। फिर भी मैंने हार नहीं मानी, हंसी को दबा ही दिया और उन्हें सांत्वना दिलानी शुरू की। मैं उनसे बोली, ‘देखो बहिन! यह तो प्रकृति का नियम है। उतार चढ़ाव, सुख दुख, आना जाना . . . तो लगा ही रहता है। माना सपने यूं ही सच नहीं होते लेकिन जो बीत गया उसे भूला देने में ही भलाई है। खाना न खाने से या रोने से अगर समस्यायें हल होने लगे तो कोई मेहनत करे ही क्यों? तुम रोना धोना बंद करो। सफलता तुम्हें जरूर मिलेगी।’ मेरे इस लंबे चौड़े भाषण का उनपर शायद कुछ असर पड़ा और वह चुप हो गयी। मैंने नमस्ते कहकर फोन रखने में ही भलाई समझी।

फोन रखते ही मेरी रुकी हंसी किसी फव्वारे की तरह फूट पड़ी। मैं हंसे जा रही थी और मुझे घेरे खड़े मेरे परिवार के सदस्य गम्भीर मुद्रा ग्रहण करते जा रहे थे। मामला अटपटा था – एक तरफ दिलासा, दूसरी तरफ हंसी के फव्वारे! सबकी जिज्ञासा बड़ी। एक साथ बोले, ‘आखिर बात क्या कही कमला बहिन ने?’ मैंने कहां, ‘भई! मरने का दुख मुझे है पर इस तरह बच्चों की तरह फूट – फूट कर रोना। कुछ बात गले नहीं उतरती।’ ‘क्या घर में कोई मर गया?’ अचरज भरी निगाहों से सबने मुझे देखा। ‘नहीं तो’ मैंने कहा। ‘कोई रिश्तेदार?’ मेरा उत्तर फिर नकारात्मक ही रहा। ‘तो क्या कोई पडोसी?’ मेरे सब्र का बांध टूट गया। मैं जोर से नाटकीय अंदाज में चिल्लाई ‘बाबा नहीं नहीं नहीं . . . ‘ ‘तो फिर क्या हुआ?’ मैंने फिर छेड़खानी के अंदाज में कहा, ‘सोचो तो जाने।’ उनसब के तो पेट में दर्द होने लगा, बेचैनी बढ़ने लगी। मैं उन्हें और दुखी होते नहीं देख सकती थी सो कमर कस ली और धड़धड़ा कर बोलना शुरू कर दिया। मैंने कहां, ‘ध्यान से सुनना। किस्सा कुछ यूं है। मैं कल कमला बहिन के घर गयी थी। उन्हें रोज एक बिजनेस करने की सूझती है। शौकीन तबियत की है। पैसे कमाने की धुन सिर पर सवार रहती है। जब तब खाली बैठी अपने दिमाग की सुईयां हिलाती रहती है। पहले पहल तो एक मशीन खरीदी। वो भी सेकेन्ड हैन्ड। लोहे की पत्ती से होल्डर बनाने की। बड़ी खुश थी कि विक्रेता को अच्छा उल्लू बनाया कम कीमत देकर। लेकिन यह कहां जानती थी कि मशीन उसके जाते ही धोखा दे जायेगी। लाख कोशिश करी मशीन को मुफ्त में भी कोई ले जाने को तैय्यार नहीं हुआ। एक तो किराये का घर, उसपर कमरा भी एक, उसपर भी कब्जा सा जमाये बैठी अड़ियल मशीन। लाख कोशिश की फिर भी कौड़ियों के दाम तक न बिकी। ऊपर से खरीदारों के चाय पानी का खर्चा। कुल मिलाकर बहुत महंगा पड़ा सौदा। दिल को जो चोट लगी सो अलग। एक सदमे से उबर न पायी थी कि दूसरे बिजनेस का आईडिया फिर दिमाग में कौन्धा दिया एक मुर्गी चूजे बेचने वाले ने। बड़ी ही मिन्नतें करी बेचारे ने एक दर्जन चूजों को बेचने के लिये। छत्तीस रूपये दर्जन से चौबीस रूपये दर्जन पर उतर आया वह मजबूर अपना पेट पालने की खातिर। चौबीस रूपये दर्जन यानि दो रूपये का एक चूजा। मन ही मन फूल कर उन्होंने जल्दी जल्दी चौबीस रूपये हाथ में थमा उसे यह सोच रवाना किया गर कहीं पलट गया तो? इसे कहते है अक्ल। फिर वही इतराना, ख्याली पुलाव पकाना। अमीर बनने के सपने देखना। वैसे सपने तो सब देखते है। रात में देखते हैं। पर दिन में देखना कोई मामूली बात नहीं। कमला बहिन जैसे खिलाडियों के ही बस का है। कोई मजाक बात है क्या? फिर लगी सुनाने घिसे-पिटे अंदाज में भई! देखो! मैंने तो सोचा है इन दर्जन भर चूजों को सही से दाना पानी दूं तो बड़े होने में क्या देर? वक्त गुजरते क्या देर लगती है। और फिर जब यह बड़े हो जायेंगे तो और चूजे हो जायेंगे। उनसे और चूजे, उनसे और . . . फिर मेरा एक फार्म हाउस होगा। मोहल्ले वाले तो मुझसे अंडे ले ही लेंगे। मुर्गी अंडे देगी मैं बेचूंगी, मुर्गो को भी बेच दूंगी, सामने ही तो है अपने अच्छन मियां कसाई। ओह! देखते देखते क्या से क्या हो जायेगा। उनका तो बोलना चालू था मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ रहा था। मैंने उनसे घर जाने की इजाजत मांगी और चली आयी। शाम को फोन आया। सपना आधा रह गया था। आखिर मैं ही तो मिली थी एक साथी दुख दर्द बांटने को। ऐसा नहीं कि दुख ही बांटते है हम दोनों सुख भी बांट लेते है कभी कभी। पर सुख मैं ही बांट पाती हूँ, मौका देती है जब कभी कभी। खैर शाम को रोयी तो न थी पर कह रही थी दगा दे गये। आधा दर्जन चूजे दगा दे गये। ठंड लगने से . . . अल्लाह को प्यारे हो गये। मेरा तो काम ही है ढाढ़स बंधाना। मैंने भी तपाक से कहा जो गया उसे जाने दीजिये जो है उसकी सलामती का सोचिये। रात को वो भी न चल बसे कुछ इंतजाम कीजिये। अबके कमला बहिन ने फोन खट से रख दिया क्योंकि उन्हें आधा दर्जन बचे चूजों को जो बचाना था। लेकिन सुबह सुबह ही मेरी कमर तुड़वा दी और अपना वही पुराना बीन बजा दिया। अब हुआ यूं था कि शाम से ही चूजों को एक लकड़ी की पेटी में बंद कर दिया। उन्हें सर्दी न लगे इसलिये हाई वोल्टेज का बल्ब लगा दिया लेकिन बल्ब कुछ ज्यादा ही गर्मी दे गया। सुबह उठी तो चूजे फूक चुके थे लकड़ी के साथ। यह तो अच्छा हुआ घर न फूका। अफसोस हो रहा होगा दाह संस्कार में भी शरीक न हो सकी। फिर चौबीस रूपये ठिकाने लगे पर कमला बहिन की अक्ल है कि कभी ठिकाने नहीं लगती। हमेशा झटके खाती रहती है फिर भी इतना तेज दौड़ती है कि थमती नहीं। सामने वाले का फ्यूज ऑफ करे रखती है।’

मेरी बात खत्म हुई नहीं थी कि डोर बैल बजी। खोला तो कमला बहिन को पाया। आते ही सबने उन्हें अफसोस जाहिर करते हुए दो आंसू टपका दिये। पर वह तो फिर शुरू हो गयी, ‘अरे भई! चूजे उड़ गये तो क्या हुआ? मैंने एक नया बिजनेस करने की सोची है। देखो भई! यह साड़ियां थोक में खरीदी हैं और . . . ‘ वह बोलती जा रही थी हम सब उनका मुह ताक रहे थे पर उन्हें होश था ही कहां? उन्होंने तो शायद एक चींटी से यह सबक अच्छी तरह घोट लिया था कि गिरो फिर उठो आगे बढ़ो . . . और यह सबक कमला बहिन ने काफी हद तक हमें भी समझा दिया था।

– मीनल

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