दुनियाँ की किसी भी माँ का सम्पूर्ण जीवन तो अपने परिवार, पति और बच्चों के लिये ही समर्पित रहता है। माँ अगर त्याग न करे तो उसके बच्चे का जीवन संवर ही नहीं सकता। मेरे जीवन में मेरी माँ का अहम् स्थान है लेकिन मेरी बुआओं का उनसे भी ऊपर। बचपन से ही मैं करनाल (हरियाणा) में अपने दादा, दादी और बुआओं के बीच स्नेहपूर्वक पली बढ़ी। जब तीसरी कक्षा में मेरा दाखिला वहाँ के एक नामी गिरामी स्कूल में कराया गया तो मैं और मेरी बुआयें खुशी से चहक उठे। दाखिले में काफी देरी होने की वजह से गर्मियां बीत चुकी थी। प्रिंसिपल मैम ने दाखिले के वक्त सख्ती से घरवालों को हिदायत दे दी थी कि बच्ची को कल से भेज दे लेकिन फुल यूनिफार्म में। सर्दी की ठिठुरन में स्वेटर पहन के जाना तो जरूरी हो गया था लेकिन उस जमाने में कहाँ बाजारों में रेडीमेड गारमेन्ट्स और स्वेटर्स मिलते थे। मेरी प्यारी बुआओं ने पर ठान लिया था कि मुझे अगले दिन सुबह सवेरे स्कूल फुल यूनिफार्म में ही भेजेंगे। बस फिर क्या था सब जुट गये काम में। एक बाजार जा रहा है कमीज स्कर्ट का कपड़ा ला रहा है, दूसरा जूते मोजे खरीद के ला रहा है, तीसरा बस्ता, टिफिन और थर्मस ला रहा है तो चौथा ऊन के मैचिंग गोले ला रहा है। बाजार से आकर कपड़े की कटाई, सिलाई का काम पूरे जोशो खरोश के साथ शुरू हो जाता है। बुआ की अंगुलियाँ सिलाईयों पे ऊन के फंदे डालती डालती सपनों में मेरे संग जुड़ने वाली रिश्तों की डोर को मजबूती से कसने लगती है। सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम, शाम से रात और रात बिना ठहरे तेजी से करवटें बदलती जा रही है और बुआ की अंगुलियाँ बिना थके बिना रुके सपनों के धागों में रिश्तों के मोती पिरोये जा रही है। मैं बिना पलक झपकाये चकित हो बीच बीच में जाग उन्हें देखती हूँ कि मेरा पूरा स्वेटर बनने में अभी कितना वक्त और बाकि है। वो मुझे हल्की सी झिड़की लगाकर फिर सोने के लिये कहती है यह वायदा करती हुई कि अपनी बिटियां रानी को तो सुबह हम फुल यूनिफार्म में ही स्कूल भेजेंगे। लाख जागने की कोशिश करने के वावजूद जाने कब मेरी आँख लग जाती है और मैं गहरी नींद सो जाती हूँ। नींद में फिर लगता है कि कोई मुझे झकझोर के कह रहा हो गुड मॉर्निंग उठो तुम्हें स्कूल जाना है। आँखें मलती मैं उठी तो मेरा पहला सवाल था बुआ मेरा स्वेटर तैय्यार हो गया, क्या मैं उसे पहन के स्कूल जा पाऊँगी? उन्होंने मुझे बाँहों में भर लिया और कहा अपनी गुड़ियाँ रानी को क्या हम सर्दी में बिना स्वेटर के भेज देते। नहा धो के पूरी तैय्यार होकर जब मैं रिक्शा में बैठ उन्हें बाय बाय करती आगे बढ़ रही थी तो बहुत खुश थी और सोच रही थी कि मेरी बुआ दुनियाँ की नजरों में मेरी माँ न सही उन्होंने मुझे जन्म नहीं दिया न सही लेकिन उनका दिल मेरे लिये एक माँ की तरह ही धड़कता है। मेरे लिये तो मेरी बुआ ही मेरी माँ हैं। मेरी बुआ दुनियाँ की सबसे अच्छी माँ हैं।

मीनल

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