एक आँख वाली माँ

एक आँख वाली माँ

अमेरिका से सुरेखा बहिन की चिठी से मालूम पड़ा कि एक भयंकर कार एक्सीडेंट में उनकी एक आँख जाती रही। दिल को गहरा आघात लगा लेकिन पैसों की मजबूरी कहें या पारिवारिक परिस्थितियों का दबाव उन्हें इंडिया से अमेरिका सांत्वना देने जाना भी नामुमकिन सा लगा।
समय करवट बदलता गया। सुरेखा बहिन ने अपने लाडले इकलौते होनहार बेटे का एडमिशन वहाँ के किसी नामी गिरामी इंगलिश स्कूल में करवाया था। बच्चा जैसे जैसे समझदार होने लगा उसे माँ का रोज स्कूल उसे छोड़ने और लेने आना अखरने लगा। एक दिन हिम्मत करके उसने माँ को कह ही दिया, ‘माँ, आप मेरे स्कूल न आया करे। मेरे साथी मुझे एक आँख वाली माँ का बेटा कह कर चिढ़ाते हैं।’ माँ ने दिल पे पत्थर रख लिया और स्कूल जाना बंद कर दिया।
समय गुजरता गया। बेटा सुशील उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्त कर एक अच्छी कम्पनी में ऊंचे पद पर नियुक्त हो गया। एक सुखी सम्पन्न घर की सुन्दर सुशील लड़की से उसकी शादी हुई। बहू ने आते ही लड़के को यह कह कर कि वो एक आँख वाली कुरूप माँ के साथ नहीं रह सकती उसे माँ बाप से अलग करवा दिया।
पोते पोतियां हुए। भूले भटके किसी पार्टी या रिश्तेदारी में मिल जाते तो एक आँख वाली दादी से कन्नी काटते।
कभी सुरेखा बहिन उन सबसे मिलने की कोशिश करती भी तो सबका एक ही जवाब मिलता, ‘आप हमसे मिलने की कोशिश न किया करे। आपके कारण हमारी समाज में इज्जत कम हो जाती है।’
फिर जीवन में एक कठोर पल ऐसा भी आया कि माँ बाप बिलकुल अकेले पड़ गये। बच्चों से मिलना जुलना बिलकुल खत्म हो गया।
कई बरसों बाद एक रोज अचानक बेटे सुशील के मन में न जाने क्या आया कि किसी रिश्तेदार से उसने माँ बाप का हालचाल जानने की कोशिश करी और उसे मालूम पड़ा कि उसकी माँ अब इस दुनियाँ में नहीं रही। वह खुद को रोक न पाया और भारी दिल लिये अपने पिता जी के पास पहुँच गया। सिर झुका के खड़ा हो गया और अफसोस जताया। घर से चलने को हुआ तो बाप ने कहा, ‘जाने से पहले तुम्हारी माँ यह खत तुम्हारे लिये छोड़ गई थी उसे पढ़ते जाओ।’ सुशील ने कपकपाते हाथों से पिता जी से खत लिया। उसे खोला। माँ ने लिखा था . . . ‘बेटा सुशील, सस्नेह आशीर्वाद! बचपन में जब तुम बहुत छोटे थे, एक कार एक्सीडेंट में तुम्हारी आँख जाती रही थी। मैंने अपनी आँख तुम्हें दे दी थी ताकि तुम्हें जीवन में किसी प्रकार की कठिनाईयों का सामना न करना पड़े, तुम्हारा जीवन सुचारू रूप से चलता रहे।’
इतना पढ़ते ही बेटे की आँखें भर आई और उसकी आत्मा उसे धिक्कारने लगी लेकिन माँ की आँख से जो आँसू गिर रहे थे उसमें से आवाज आई, ‘बेटे! मत रो। मैं आज भी हर पल हर कदम तेरे साथ हूँ। तेरी आँखों से मैं आज भी सारी दुनियाँ देख सकती हूँ, तुझे देख सकती हूँ, महसूस कर सकती हूँ।’ सुशील को लगा उसने हमेशा के लिये अपनी माँ को खो दिया लेकिन माँ दूर रहते हुए भी शायद उसे कभी भूला न पाई थी।

मीनल

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