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एक साल एक सदी सा - हिन्दी लेखक डॉट कॉम
एक साल एक सदी सा

एक साल एक सदी सा

ऑफिस की घड़ी में छह बजने को आये थे। इस वक़्त ऑफिस से ज्यादा वहाँ के रिसेप्शन पे हलचल होती थी, सब एक एक करके घर जो जाने लगे थे पर आज रिसेप्शन से ज्यादा हलचल आँचल के दिल में मची थी जो उसके चेहरे पे साफ साफ दिख रही थी। आज उसका ध्यान भी काम से ज्यादा लगातार मोबाइल फोन पे आ रहे SMS की तरफ जो था। ओह हो! Miss Punctual आज अभी तक ऑफिस में ही कैसे? सौरभ ने तंज करते हुए पूछा। रोज अपनी खिलखिलाती हँसी से सबको Bye बोल के जाने वाली आँचल ने आज एक बासी सी मुस्कान देते हुए कहा . . . नहीं बस निकल ही रही हूँ और अपने मोबाइल फोन को पर्स में रखते रखते रुक गई। दिन भर से silent mode पर पड़ा हुआ मोबाइल फोन अचानक vibrate हुआ . . . One new message received। अपने चेहरे से बाल हटाने के बहाने सौरभ से दूरी भांपते हुए आँचल ने मोबाइल फोन पे नजर डाली, मैसेज में लिखा था . . . आजकल ऑफिस से कितने बजे निकलती हो? . . . यह एक ही मैसेज आज दोपहर से बार बार आँचल को आ तो रहा था पर उसका जवाब वो अभी तक नहीं दे पाई थी, काम की मसरूफियत की वजह से नहीं बल्कि यह सोचकर कि आज अचानक उसको मेरी याद कैसे आ गई? सौरभ को साथ आता देख मोबाइल फोन को जोर से हाथों में भींच कर आँचल ऑफिस की संकरी अँधेरी सीढ़ियों से नीचे उतर आई। बाहर की रोशनी से मूंदी हुई आँखों को खोला तो आँखे खुली की खुली रह गई। सामने पार्किंग में एक लड़का खड़ा था जो आँचल का ही इंतजार कर रहा था, शायद . . . दोपहर से ही। सौरभ सामने नितिन खड़ा है, आँचल ने हड़बड़ाहट में कहा . . . कौन नितिन? सौरभ का सवाल पूरा भी नहीं हुआ था कि आँचल पार्किंग में जा पहुँची थी। घबराहट में सूखे गले का सारा पानी आँचल की आँखों में उतर आया था। माँ के जाने के बाद कितनी अकेली हो गई थी जानते हो . . . एक साल तक कहाँ थे तुम? इस एक सवाल ने नितिन को जैसे झकझोर के रख दिया था। एक साल . . . नितिन को जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था खुद पे कि वो आँचल से एक साल के बाद मिल रहा हो। परेशानियां जब किसी के दामन से लिपट जाती हैं न किसी अजगर के बेरहम शिकंजे की तरह तो वक़्त कैसे तेज लम्हों की रफ्तार पकड़ के सरपट दौड़ा चला जाता है, पकड़ में ही नहीं आता, कई बार खुद को भी मालूम नहीं पड़ता। कुछ ऐसा ही हुआ था नितिन के साथ भी। अभी कल ही की तो बात लगती है जब आँचल और वह एक ही ऑफिस में . . . एक ही छत के नीचे . . . एक दूसरे के आमने सामने . . . एक दूसरे से नजरे मिलाते . . . एक दूसरे के करीब से होकर गुजरते . . . एक दूसरे के इतने नजदीक आ गये थे कि दोनों के दिलों की धड़कने कब एक होकर धड़कने लगी और कब आँखों ही आँखों में वो एक दूसरे से प्यार कर बैठे . . . उन्हें मालूम ही नहीं पड़ा था।
नितिन और आँचल के बीच प्यार जैसा कुछ था तो लेकिन . . . दोनों एक दूसरे से कभी मिले नहीं थे। हाँ . . . यह जरूर था कि नितिन आँचल से फोन और मैसेजेस के जरिये लगातार सम्पर्क बनाये रखते थे और अपने प्रेम का भी लगातार जोरों शोरों से इजहार करते रहते थे। आँचल की समझ से यह परे की बात थी कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी हो सकती थी जो नितिन न तो कभी अपनी कोई पर्सनल डिटेल्स देते थे . . . न ही रिश्ते को आगे बढ़ाने की कोई बात ही करते थे और न ही उन दोनों की कहीं कोई मुलाकात ही हुई थी। लेकिन . . . नितिन और आँचल के बीच फोन और मैसेजेस से जो भी बात होती तो . . . नितिन की प्यार भरी,रस भरी रसीली, मदहोश कर देने वाली मीठी बातों और अपनाहट के आगोश में समाकर आँचल प्यार व ऐतबार के दरिये में बह कर कहीं दूर प्यार के लम्हों से सराबोर हसीं वादियों में खो जाती।
यह सिलसिला चलता रहा साल दर साल . . . लम्हा दर लम्हा . . . और फिर कुछ ऐसी परिस्थितियां बनी कि आँचल को अपनी जॉब से रिजाइन करना पड़ा। अपनी बीमार माँ की देखरेख के लिए वो अपने शहर वापिस जो लौटना चाहती थी। अब वो जिस ऑफिस में थी, वह उसके घर से काफी करीब था। ऑफिस और माँ दोनों को वो बखूबी सम्भाल रही थी। नितिन से लगातार कांटेक्ट बना रहता था। दोनों के बीच यथार्थ के धरातल की दूरियां और वक़्त की मजबूरियाँ तो थी लेकिन लगातार बातचीत से कहीं मन में एक गहरा संतोष भी बना रहता था। फिर अचानक एक दिन . . . नितिन ने फोन रिसीव करने बंद कर दिये, मैसेजेस का भी जवाब नहीं . . . आँचल तो जैसे सपनो की दुनियाँ से फिसलती हुई निकलकर यथार्थ के धरातल पर इतनी जोर से गिरी कि दिल को चोट तो लगी पर माँ के प्रति जिम्मेदारी ने दिल को कहीं टूटने से बचा लिया। नहीं तो . . . उस दिन तो आँचल को अपने जिंदा होने का अहसास भी नहीं हो पा रहा था।
नितिन का यूँ अचानक जिन्दगी में आना और यूँ चले जाना . . . आखिर क्या है यह जिन्दगी? सच में कई बार तो लगता है पूरी फिल्मी है . . . पहले फिल्मों की कहानियां झूठी लगती थी लेकिन इस अनचाहे अनुभव के बाद सच्ची लगने लगी थी। वक़्त कहां किसी के लिये ठहरता है, बड़ी तेजी से मेरे हाथों से रेतीले कणों की तरह फिसला चला जा रहा था। कितना चाहा माँ ठीक हो जाये, मेरे साथ जीवन के कुछ और पल जिये पर ऐसा हो न सका। माँ का साथ छूटने पर मैं कितनी अकेली हो गई थी और उस पर नितिन की बेरुखी . . . सीने पर जैसे पहाड़ से टूट रहे थे।
अचानक सौरभ की मद्धिम रोशनी में आहिस्ता आहिस्ता रेंगती सी कानों में पड़ती आवाज ने मुझे फिर यादों की दलदल से खींच कर सच के धरातल पे एकदम से सूखा सा, बुझा सा खड़ा कर दिया, जैसे की कभी मैं प्यार की बरसातों में गीली ही नहीं हुई थी और जैसे न ही कभी खुशियों की किरणें मेरे लबों पे भी दौड़ा करती थी। सौरभ लगता है हमेशा की तरह अपने घर भागने की जल्दी में था लेकिन जाने से पहले उसने कह ही दिया मैडम सर से इंट्रोडक्शन नहीं कराएगी? मैंने हाँ में सिर हिलाते हुए कहा कि मैं पहले जिस ऑफिस में थी वहां नितिन भी काम करते थे। इतने में अचानक सौरभ के मोबाइल फोन पे किसी का कॉल आया। शाम को तो कॉल घर से ही होगा . . . मैंने जैसा सोचा था वैसा ही निकला। सौरभ आनन फानन में हम दोनों से इजाजत मांगकर अपने घर रवाना हो गया।
नितिन जो अब तक खामोश खड़े थे, उनकी एक साल की खामोशी का बान्ध जैसे टूट पड़ा था। नितिन ने आँचल का हाथ हाथों में लेकर उसकी आँखों में आँखें डालकर गंभीर मुद्रा में, अपने पुराने अंदाज में वही पुरानी बात दोहराई जो वह इससे पहले न जाने कितनी बार जाने अंजाने दोहरा चुके थे। नितिन ने कहा, आँचल I still love you so much as always and forever . . . तुम विश्वास करती हो न मेरे प्यार पर? मैं तुम्हें सब कुछ बताना चाहता हूँ कि इस बीते एक साल में मेरे साथ क्या क्या हुआ। तुम सुनोगी न? नितिन कहे चले जा रहे थे और मैं सुने चली जा रही थी . . . उनकी अनगिनत परेशानियों की एक लम्बी फेहरिस्त . . . एक दर्द में गुजरे एक लम्बे साल की तरह ही एक सदी सी लम्बी। मन ही मन में सोच रही थी कि देखो प्यार भी क्या चीज है . . . मैं जिन्दगी के इस मोड़ पे नितिन को अपना नहीं सकती तो दुत्कार भी नहीं सकती। हमारा रिश्ता शादी के पवित्र बंधन तक पहुँचता है कि नहीं यह तो वक़्त ही बतायेगा लेकिन हम दोनों के बीच प्यार की जड़ें इतनी मजबूत हैं, इतनी गहरी हैं, इतनी परिपक्व हैं कि चाहे तो मैं या नितिन या कोई और ही क्यों न हो, चाह कर भी उन जड़ों को काट नहीं सकता। हमारे दिलों के बीच जो रिश्ता है वो है प्यार का . . . सच्चे प्यार का, सम्मान का, विश्वास का, जो वक़्त के साथ पनपेगा ही। यह प्रेम का पौधा जो हम दोनों ने जाने अनजानें कभी एक साथ मिलकर अपने सूने जीवन की बगियाँ में लगाया था वो अब एक न एक दिन तो हरा भरा गहरा भरपूर चहु दिशाओं में अपनी अजगर सी मजबूत और विशाल बाजुए फैलाता हुआ एक खूबसूरत, खुशनुमा और प्रेम के अहसास से सराबोर दरख्त बनकर गुलमोहर के फूलों से महकेगा ही और हमारे सहज, सरल, अमिट, निश्चल और पावन प्रेम के रिश्ते को बदस्तूर ताउम्र महकायेगा ही।

मीनल

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