टूटे सपने

टूटे सपने

टूट गये न सपने
नहीं सुधरी मानव जाति
तुम शहर की तरफ कूच
मत करना
यहाँ जंगलराज है
सभ्य नहीं है
संस्कारी नहीं है
इस दुनिया के लोग
दूर के ढोल सुहावने होते हैं
इनके पास आने की या
इनके बारे में सोचने की
चेष्टा भी मत करना
भौतिकतावाद की दौड़ ने
आज के समाज को अंधा
बना दिया है
खुद को प्रगतिशील कहते हैं
सारी भावनाओं को ताक पर
रख
एक मशीन सी
जिन्दगी जीते हैं यह लोग
खुदगर्जी से भरे पड़े हैं
होशियार हैं इतने कि
भूले भटके घर जाओ
इनके
न दरवाजा खोले
न एक कप चाय की प्याली को
पूछते हैं यह लोग
बेतहाशा दौड़े जा रहे हैं
एक दूसरे को धक्का देकर
आगे बढ़ रहे हैं
बिना बात
उत्तेजित हो एक दूसरे की
गर्दन काट रहे हैं
न आज्ञाकारी हैं
न परोपकारी हैं
न पढ़े लिखे हैं
न व्यापारी हैं
यह सब तो बस मदारी हैं
अपने ही इशारे पे
नाचते बंदर हैं
यह तो जुआरी हैं अपना दीन ईमान दांव पे लगाते
यह तो बस शिकारी हैं मासूमों को मौत के
घाट उतारते
तुम इन जैसा बनने का
प्रयास कभी न करना
जंगल में ही रहना
इनसे कभी प्रभावित न होना
तरक्की तो महज एक दिखावा है
यह चोर हैं, झूठे हैं
लुटेरे हैं, मक्कार हैं, दलाल हैं
प्यार जताना तो बस एक
छलावा है
तुम जैसे हो
बहुत अच्छे हो
भगवान की एक सम्पूर्ण
रचना को तुमने जिन्दा रखा
मिटने न दिया
यह मानवजाति तो दानव है
जो मानवता, भगवान की हर संरचना, प्रकृति, संसार
इस दुनिया
को जड़ से मिटाने में
सक्षम है
पारंगत है
पूरे दम खम से
मानव समाज की मानवता
को जड़ समेत उखाड़ने पर तुले हैं।

मीनल

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