बदलाव जरुरी है…

थक से गए हैं पाँव कोई पड़ाव जरुरी है !!

सड़ने लगा है दरिया ज़रा बहाव जरुरी है !!

 

बस्ती बस्ती गाँव गाँव से आने लगी हैं चीखें,

हालात बदलने होगे अब बदलाव जरुरी है !!

 

कपडे सारे छीन लिए हैं कम्बल देने वाले,

जिस्म कांपने लगे हैं अब अलाव जरुरी है !!

 

ज़ख्म किसी का क्या समझेगे ऊँची कुर्सी वाले,

घाव समझना है तो खुद पर घाव जरूरी है !!

 

हाथ उठाओ ढूँढो पत्थर सर पर ही दे मारो,

ये सूरत बहुत पुरानी है पथराव जरुरी है !!

 

बहने लगी है बदहाली के दरिया में ये बस्ती,

हाथों को पतवार करो इक नाव जरुरी है !!

  • – कुलदीप द्विवेदी
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