वो दिन नहीं रहे अब

वो दिन नहीं रहे अब

वो दिन नहीं रहे अब, ना रही अब वो रातें,
बदले की हैं भावना सबकी, ऐसे हो गए हालातें।
नहीं दिखती अब वो मीठी बोली, जज़्बातें वो प्यार भरे,
नफ़रत, हिंसा, मार-कुटाई, एक-दूजे पर वो वार धरे।
वो भी क्या दिन थे, जब आँगन में मेला लगता था,
अक्सर साथ पड़ोसी के, हँसी का रेला सजता था।
मिलजुल कर रहते थे सारे, सहयोग भरा था सबके मन में,
काम आते थे हर विपदा में, द्वेष नहीं था अंन्तर्मन में।

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Rahi Mastana

Part time writer/Author/Poet

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