बुआ जी के घर

बुआ जी के घर

जब भी याद करती हूं बुआ जी के घर की यादें मुझे याद आती है। वंहा की भोर जो अलसभोर होती थी। बेहद शांत सुबह हो रही होती थी। अभी दिन नही निकला होता था। मै बिस्तर से उठकर बुआजी को ढुंढती पीछे चौके मे पहुंच जाती थी। बुआ जी मुझे मुस्कराकर मधुर आवाज मे बुलाती। मै अभी भी नींद की खुमारी मे होती थी।

बुआजी चुल्हे मे पानी गर्म करके सामने बरामदे मे आती, जंहा की छपरी के किनारे नाली के पास वो मुंह धोती थी। तब सामने की बाडी मे पेडों के झुरमुट पर कौओं का झुंड जागकर कांव कांव का शोर मचा रहा होता था।

आजकल कौऐं नही दिखते, क्योंकि पेडों के झुरमुट नही रहे। मैने जाकर देखी तो वंहा अब घर बन चुके है। पेडों के झुरमुट कट चुके है। कौऐं की प्रजाती लुप्त हो गई है। प्रदुषण और रेडिएशन बढ चुका है। हमे अपने पर्यावरण को बचाना है तो घने छायादार पेड लगाने होंगे। वरना कौऐ क्या होते थे । हम बच्चों को नही बता सकेंगे।

बढते विकास के साथ हमने पशु-पंछियों को बेघर कर दिया है,जिसका हमें अहसास तक नही है।

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Jogeshwari Sadhir

मै एक हिंदी लेखिका हूं.मेरी १२ किताबें प्रकाशित हो चुकी है.तेरहवी किताब जल्द आ रही है. मै स्क्रीप्ट व गीत भी लिखती हूं.जो फिल्म स्क्रीप्ट लिखना चाहते है.मुझसे संपर्क करें मेरा व्हाट्सअप नंबर है8109978163

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