हरि भजन -2

हरि भजन -2

हरि भजन

मुझे हरि तेरो नाम की
रट, अब रटन लगी
दिन, दोपहरीया, साँझ
अब करू तेरो भजन
मन के मेरे मंदिर में,
तेरी सांवलिया सी मूरत
अब बसन लगी
मुझे हरि तेरो नाम की
रट, अब रटन लगी ।

हरि, हरि अब होत जात
रोम, रोम, मेरो
बेरी यह जग कहत जात
दूजा ना अब कोई
क्या काम तेरो
मुझे हरि तेरो नाम की
रट, अब रटन लगी ।

हर पल निहारु
हर पल बाट जोहु
अब तो में तेरो
बनकर, राम, कान्हा
अब तो कुटिया
में तुम हमारे पधारो
मुझे हरि तेरो नाम की
रट, अब रटन लगी ।

में भी चख, चख कर बनाऊं
तेरो लिए मीठे पकवान
कभी तो हरि
फुर्सत मिले तो
घर इस “श्याम” के
तुम पधारो
मुझे हरि तेरो नाम की
रट, अब रटन लगी ।

हरि, हरि, मानव जो तू बोले
हरा, हरा, यह जीवन होय
हरि की जो शरण में आए
कब उसका बाल भी बांका होय
जीवन, मरण, की फिक्र
अब घटन लगी
मुझे हरि तेरो नाम की
रट, अब रटन लगी ।

बोल हरि, बोल हरि, बोल हरि
बोल, बोल, हरि, हरि ।।

✍️श्याम सिंह बिष्ट

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Shyam singh bisht

कवि , लेखक डोटल गाँव उत्तराखंड

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