नजरों का फर्क

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नजरों का फर्क

By |2018-01-20T17:09:04+00:00March 18th, 2016|Categories: बाल कथाएँ|0 Comments

एक गुरुकुल में दो राजकुमार पढ़ते थे । दोनों में  घनी मित्रता थी |
एक दिन उनके आचार्य दोनों को घूमने ले गए |  भूमते हुआ वे काफी दूर निकल गए| तीनो प्राकृतिक शोभा का आनंद ले रहे थे |
तभी आचार्य की नज़र आम के पेड़ पर पड़ी । एक बालक बालक आया और पेड़ के तने पर डंडा मरकर फल तोड़ने लगा । आचार्य ने राजकुमारों से पूछ, क्या तुमने दोनों ने यह दृश्य देखा? ‘ ‘हाँ गुरुदेव ‘ राजकुमारों ने उत्तर दिया| गुरु ने पूछा , ‘ इस दृश्य के बार में तुम दोनों की क्या राय है? ‘ पहले राजकुमार ने कहा, ‘ गुरुदेव, मैं सोच रहा हूं कि जब वृक्ष भी बगैर डंडा खाए फल नही देता, तब किसी मनुष्य से कैसे काम निकला जा सकता है | यह दृश्य एक महत्वपूर्ण सामाजिक सत्य की ओर इशारा करता है | यह दुनिया राजी- ख़ुशी नहीं मानने वाली है | दबाव डालकर ही समाज से कोई काम निकला जा सकता है| ‘ दूसरा राजकुमार बोला, ‘ गुरु जी, मुझे कुछ अलग लग रहा है| जिस प्रकार यह पेड़ डंडे खाकर भी मधुर आम दे रहा है, उसी प्रकार व्यक्ति को भी स्वयं दुःख सहकर दूसरों को सुख देना चाहिए | कोई अगर हमारा अपमान भी करे तो उसके बदले हमें उसका उपकार करना चाहिए | यही सज्जन व्यक्तियों का धर्म है| ‘ यह कहकर वे गुरुदेव का चेहरा देखने लगे | गुरुदेव मुस्कराये और बोले, ‘देखा, जीवन मैं दृष्टि ही महत्वपूर्ण है| घटना एक है लेकिन तुम दोनों ने उसे अलग- अलग रूप मैं ग्रहण किया, क्योंकि तुम्हारी दृष्टि मैं भिनन्ता है| मनुष्य अपनी दृष्टि के अनुसार ही जीवन में किसी प्रसंग कि व्याख्या करता है और उसी के मुताबिक फल भोगता है| दृष्टि से ही मनुष्य के स्वाभाव का पता चलता है | ‘ गुरु ने पहले राजकुमार से कहा, ”तुम सब कुछ अधिकार से हासिल करना चाहते हो जबकि तुम्हारा मित्र प्रेम से सब कुछ प्राप्त करना चाहता है |”

सौजन्य — दीपशिखा वार्षिक पत्रिका

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