प्रेम की कस्तूरी

प्रेम की कस्तूरी

प्रेम का ज्ञान
समस्त सृष्टि को है
एक मानव जाति के सिवाय
धर्म के नाम पर
कर्म के नाम पर
दर दर भटक रहा
प्रेम को भीतर नहीं
बाहर खोज रहा
मृग की भांति
नाभि में न खोज
प्रेम की कस्तूरी को जंगल जंगल
मारा मारा
ढूंढ रहा।

मीनल

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu