अभागा

अभागा

एक बात सुनो
तुम्हारे कान में कहनी है
यह मानव कितना मूर्ख है
प्रेम की परिभाषा न जाने
कितना तुच्छ प्राणी है
प्रेम की सरलता न पहचाने
जटिल बना दिया इसने तो इसे
एक पहाड़ सा
एक कीड़े सा रेंगता रहे
इसपे चढ़ना भी न जाने
यह प्रेम की भाषा न लिख
सके
न पढ़ सके
न बोल सके
न समझ सके
न सुन सके
न महसूस कर सके
कैसा अभागा है
ईश्वर को खोजे
और ईश्वर की बनाई सृष्टि
को ही नकारे
ईश्वर बसे हर किसी के दिल में
कण कण में करते निवास
प्रेम का बंधन ही बांधे
समस्त सृष्टि को एक डोर में
इतनी छोटी सी बात को
दिल बड़ा करके
हे मनुष्य
तू क्यों नहीं स्वीकारे।

मीनल

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