अब मर जाना चाहिये

दूसरों के सपनों से,

आस लिये अपनों से,

जाने-अनजाने लोगों के दिल से,

अब मर जाना चाहिये।

 

सोती हुई आँखों से,

बहते हुए आंसुओं से

सिमटती हुई तनहा मुस्कान से,

अब मर जाना चाहिये।

 

किताब में दबे गुलाब से,

गुलाब जिसको देना है उसके ख्वाब से,

मुरझाई पंखुड़ियों की खुशबू से,

अब मर जाना चाहिये।

 

बोले जा चुके अनगिनत झूठों से,

प्रमाणित-अप्रमाणित सत्यों से,

खुद में झगड़ते तर्कों से बस,

अब मर जाना चाहिये।

 

सूरज बाघेल “आर्य”

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This Post Has 2 Comments

  1. बहुत ही सुंदर रचना

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  2. very nice !!

    Rating: 4.0/5. From 1 vote. Show votes.
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