मन काहे  होत अधीर

संत योगराज के पास अनेक शिष्य शिक्ष्या ग्रहण करते थे | उनके द्वारा पढ़ाये गए अधिकतर शिष्य अपने जीवन में सफल थे, क्योंकि वे अपने शिष्यों को पाठ्य पुस्तको के साथ -२ व्यवहारिक शिक्ष्या भी प्रदान करते थे| एक बार वे अपने शिष्यों को लेकर जंगलों की ओर जड़ी – बूटियां ढूढ़ने जा रहे थे| रास्ते में उन्हें व शिष्यों को प्यास लगी| कुछ दूर जाने पर उन्हें एक खेत दिखाई दिया , जहाँ पर एक किसान काम कर रहा था | उन्होंने किसान से पानी पिलाने का आग्रह किया | किसान सबके लिए पानी का प्रबंध करने चला गया |

इस बीच गुरु जी खेतों में इधर- उधर चूमने लगे| वहां पर उन्हें कई गड्डे दिखाई दिए | यह देखकर एक शिष्य बोला, ‘ गुरु जी खेतों में इतने गड्ढे क्यों है| ‘ गुरु जी अपने शिष्य से बोले खेत में इतने गड्ढे कुआँ खोदने के लिए किये गए है| किसान ने पानी की तलाश में कुछ फीट तक गड्ढा खोदा जब उसे पानी नहीं मिला तो उसने एक जगह छोड़कर दूसरी जगह गड्ढा खोदा , इस तरह उसने कई जगह गड्ढे खोदे, लेकिन पानी नहीं मिला|
तब तक किसान सभी के लिए पानी लेकर आ चूका था | उसने कहा गुरु जी आप सही कह रहे है | मैंने यहाँ पर कुआँ खोदने ले लिए ही गड्ढे किये थे , लेकिन कहीं पर पानी नहीं मिला| ‘ इस पर गुरु जी बोले, अगर तुम ‘अगर तुम लगन व ढृढ़ विश्वास के साथ एक ही गड्ढे पर कड़ी मेहनत करते तो तो निश्चय ही तुम्हें पानी मिल जाता| लेकिन धैर्य न होने के कारण न ही यहाँ कुआँ बना और न ही तुम्हें पानी मिला | तुम्हारा श्रम व्यर्थ चला गया|’
इसके बाद वे अपने शिष्यों से बोले , ‘तुम सब यह बात गाँठ बांध लो कि चाहे कितनी भी मुसीबत आए, लेकिन इस किसान की तरह अपने किसी काम को बीच में नहीं छोड़ना | धैर्य एवं एकाग्रता के साथ उसे अवश्य पूरा करना|’ किसान भी गुरु जी की बात समझ गया| इसके बाद उसने धैर्य से एक ही गड्ढे को अंदर तक खोदा तो वहाँ पानी मिल गया | गुरु जी की बात पर अमल कर किसान ने धैर्य व परिश्रम से आखिरकार वहाँ कुआँ बना ही लिया|

सौजन्य –  दीपशिखा वार्षिक पत्रिका

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