बोध

बोध

मेरे प्रियजन की आत्मा
परमात्मा में विलीन हो गई
छोड़ गई अपने कुछ अंश
इस धरती पे
अंश अंश जोड़कर भी
आत्मा से मिलन नहीं हो पा रहा
परमात्मा में भी आत्मा का दर्शन
नहीं हो रहा
यह दिल को कब तक बहलाऊं मैं
इस दुनिया में जीने के कितने भ्रम
पालूं मैं
यह कुछ जिम्मेदारियों का बोझ
अभी शेष है मुझपर
कुछ महत्वपूर्ण कार्य भी पड़े हैं अधूरे
जिनके लिये जन्म लिया मैंने
इस धरा पर
इन सबका बोध मुझे गर न हो
और मैं जो होती अबोध
तो सच पूछो
दिल की कहूं तो
मेरे अपनों के बिना अब मुझसे
एक पल भी इस दुनिया के
भंवर में जिया नहीं जा रहा।

मीनल

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