हमारा घर मतलब बाबूजी का घर झरोखा महल जैसा था.बडी रौनक होती थी उन दिनों.बाबूजी के यंहा सामने की छपरी मे झूला डला था.जिसपर हम कभी भी बैठकर झूलते थे,साथ में रेडियो भी सुनते.मुझे याद है,ऐसे ही बारिश के दिनों में झूला झूलते हुए सुनी थी ये अमर गीत,जो आज भी जेहन में गूंज रहा है.

वो मां -बाबूजी के घर का स्नेह,बहन-भाई का साथ,आने जाने वालों की चहल-पहल सबको याद कर इस गीत को लिख रही हूं.

मेरी तान से उंचा तेरा झुलना गोरी

मेरे झुलने से लंबी तेरे प्यार की डोरी

झेडे हम तुम मल्हार

प्यार झलके,हो हो प्यार छलके

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