यूकेलिप्टस, कौवे और मैं

यूकेलिप्टस, कौवे और मैं

हर रात जैसे तैसे करवटें ले लेकर गुजरती। हर रात सुबह का इंतजार, हर सुबह जेठ की भरी दुपहरी का इंतजार, हर दोपहर शाम होने का इंतजार, हर शाम रात होने का इंतजार और हर रात फिर अगली सुबह होने का इंतजार। यह इंतजार किसी प्यार में आवारा, पागल, दीवाने प्रेमी के लिये नहीं था बल्कि किसी को छेड़ने के लिये था।
बचपन में मेरी उम्र और कद बेशक छोटे हो लेकिन मेरी शरारतों का कद बहुत ऊंचा था लेकिन ग्राउंड फ्लोर पे खड़े होकर वह यूकेलिप्टस के पेड़ों के घोंसलों में रह रहे कौवों को छू नहीं पाता था तो उन्हें छेड़ने छत पर जाना पड़ता था। सुबह हो, दोपहर हो या शाम, जब मौका देखा एक छलांग में छत पर पहुँच अलग अलग कोने में खड़े यूकेलिप्टस के पेड़ों में रह रहे कौवों को या तो कांव कांव करके छेड़ना या उन्हें कंकड़ मारकर उड़ा देना।
कुछ दिनों तक तो यह सिलसिला मेरी मर्जी के मुताबिक ही चलता रहा। मुझे यह सब करने में बहुत मजा आता था।
धीरे धीरे कौवे मुझे पहचानने लगे। उन्होंने शायद अपने घोंसलों में अंडे भी दे दिये थे। मैं उनके अंडों को हानि न पहुचाऊं इसके लिये वो सतर्क थे। उन्होंने एकजुट होकर मुझसे छुटकारा पाने की एक युक्ति लड़ाई।
एक शाम मैं जैसे ही छत पर पहुंची एक कौवा मुझे देखते ही जोर जोर से कांव कांव चिल्लाने लगा। देखते ही देखते न जाने कहाँ से अनगिनत कौवे मेरे ऊपर टूट पड़े।
अपनी चोंच और पंजों की धार वो शायद रातों रात तेज कर चुके थे। हमारे घर की छत एक युद्ध का मैदान बन गई थी। ऐसा लग रहा था जैसे सब अपने अपने घोड़े पर सवार एक कुशल योद्धा की तरह मुझसे जंग जीतने पर उतारू हों।
कांव कांव करके सब मेरे सिर पर मंडरा रहे थे और मुझे चेतावनी दे रहे थे कि सुन ओ शरारती लड़की आज के बाद तू हमारे इर्द गिर्द दिखनी नहीं चाहिए वरना तेरी खैर नहीं। वो तो भला हो कि कुछ लिखने पढ़ने के लिए मैं अपनी कॉपी किताबें साथ में लेकर गई थी। उन्हें मैं एक कवच की तरह चक्रव्यूह में फंसे अर्जुन की भांति इस्तेमाल न करती तो उस दिन मेरा लहूलुहान होना तय था।
उस दिन कौवों की फौज से मैंने किसी तरह अपनी जान तो बचा ली और छत से सीधी नीचे उतरती सीढ़ियों पर सरपट भागती घर के एक कमरे में घुस गई।
कौवों ने मुझे इतना भयभीत कर दिया था कि मैंने उन्हें कभी छेड़ना तो दूर उनकी तरफ आंख न उठाने की कसम उठाई। न जाने कितने दिनों मैं न तो छत न ही बाहर आँगन या खुले में ही निकली। शुरू शुरू में जब भी मैं निकलती कौवे मुझ पे आक्रमण कर देते लेकिन क्योंकि वो सब मुझे भली भांति पहचान गये थे लेकिन धीरे धीरे जब मैं कम दिखी, मेरी शरारतें कम हो गई तो आखिरकार उन्होंने मुझे माफ कर दिया। यह मैं जान पाई जब मैं एक दिन बड़ी हिम्मत बटोर कर छत पर गई। यूकेलिप्टस के पेड़ के पास गई लेकिन कौवों ने मेरे सिर पर चोंच और पंजे नहीं मारे। लेकिन मैंने भी एक अच्छी बच्ची की तरह उन्हें छेड़ा नहीं, सताया नहीं।

मीनल

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