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धरती की सूखी चादर पर
बारिश की पहली दस्तक
चमके बिजली,
घनघोर घटा,
बरसे झमाझम,
मौसम की परत खुलने लगी है।।
चले पुरवाई,
काली घटा छाई,
खोल दो सारे खिड़की दरवाजे
मिट्टी की सौंधी खुशबू आने लगी है।।
मोर पपीहा,चकवी चातक,
खुशी मनाए,
प्यासा मन,कृषक हरषाए
कबसे कर रहे इंतजार
लगता है, आस पूरी होने लगी है।।
होकर पानी से
तर बतर, लताऐं,
मिलने को आतुर, करने आलिंगन
पेड़ों की डाली भी झुकने लगी है।।
भरे ताल तलैया,
थे प्यासे अब तक
छलकाए मन,
कागज की नाव,वो छपाके
बचपन की यादें उमड़ने लगी हैं।।
गीली हरी घास पर,
लाल सुर्ख मखमली,
सावन की डोकरी,
रात वो सावन की मीठी मल्हार
कोयल की कूक कुहुकने लगी है।।
प्यासी प्रेयसी,
तृप्त प्रियतम संग,
सावन बरसे,
भीगा आंचल,भीगा तनमन
सपने में भी संवरने लगी है।।
संग सहेलियों,
मां बाबा से,
गली,मोहल्ला,
अपनी धरती और धरा से
मिलने की चाहत बढ़ने लगी है।।

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