दिल से पूछो

दिल से पूछो

चाहती हो तुम, रहो मेरे ही
मैं तुम्हारी हूँ, या नहीं
यह जरूरी भी नहीं
पाना चाहती हो, इज्जत, प्यार
इज्जत और प्यार
देने से मिलता है
जितना दोगे, उससे दुगना मिलेगा
नहीं, तुम कुछ नहीं जानती
ये जो तुम्हारा ” मैं ” है न
यही तुम्हें प्यार से वंचित रखता है
कभी जब अपने “स्व” से बाहर आना
क्या खोया और क्या पाया तब देखना
लेकिन तब तक कितना बचेगा
इसका हिसाब कौन रखेगा?
अपने ‘दिल से पूछो’।

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