लुप्त

लुप्त

यह सुबह और सांझ
एक जैसी होती हैं
सूरज उग रहा है या
ढल रहा है
पता नहीं पड़ता
मनोहारी दृश्य दिखते हैं
हरे पेड़ों के झुरमुटों के
बहते पानी में
प्रतिबिम्ब बनाती उनकी
हरी काया भी काइया रंग की
दिखती है
रात को सब मिट जाता है
एक अदृश्य लकीर सा
काले रंग का अंधियारा होता है
पीले रंग का आसमां में
लटका चाँद
सुबह का सुकून
आंखों की ठंडक
मन की हरियाली
वीरानों की तृप्ति
खामोशी में गुनगुनाती
निशब्द अफसाने की भक्ति
जाने एक टूटते सितारे सी कहाँ
लुप्त हो जाती है।

मीनल

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