नया बचपन

नया बचपन

ना लकड़ी की काठी है,
ना काठी का घोड़ा …….
कोका-कोला संग आंख मारता,
नन्हा मन दौड़ा ।
नानी की मोरनी ,,,,,
घर पे लूडो खेल रही।
चंदा मामा के पुए बनाके,
दादी-नानी हार गयी।।
छुपा-छुपी ,पिड्डू , खों-खों
बीते कल की बात लगे।
कैन्डी-क्रश, पोकेमोन,
पबजी मेरे हाथ लगे।।
मां की दाल फीकी पड़ गई,
मैगी की रौनक छाई है ।
गुड्डे -गुडियां पीछे छूटे,
कूल स्वैग की बारी आई है।।
रामायन , महाभारत तो सिर्फ कहानी है,
डोरा, सुनियो, नोबिता की बात मानी है।
पल में बोरियत होती है,
मोबाइल पे नजरें तानी है।।

-डॉ.नेहा अवस्थी मिश्रा

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Golden Ray A Sunahri

-होम्योपैथिक चिकित्सक -रेकी मास्टर -कविता लेखन

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