ज़रा सी बेवफ़ाई

ज़रा सी बेवफ़ाई

ज़रा सी बेवफ़ाई करना जरूरी था
ख़ुद में उलझती साँसों का सुलझना जरूरी था

कब तक रोक कर रखते इस सैलाब को
अश्क़ के पैमाने का छलकना जरूरी था

बहुत तबाही मच चुकी इश्क़ के दयार में
उफनते दरिया का अब थमना जरूरी था

एहसासों की बर्फ़ जमें ज़माना गुजर गया
परत दर परत अब पिघलना जरूरी था

तेरे लौट आने की आहट को रास्ते तरस गये
हिज़्र की रात का अब ढलना जरूरी था

मोहब्बत की क़समें वादे बहुत हो लिए ज़नाब
इसे जीने के लिए मिलकर बिछड़ना जरूरी था….

No votes yet.
Please wait...

Aarti Human

अब हाल-ए-दिल ना पूँछ कि ताब-ए-बयाँ कहाँ अब मेहरबान ना हो कि जरूरत ना रही....

Leave a Reply

Close Menu