अफसोस

अफसोस

क्या मीठा क्या कड़वा
क्या सच क्या झूठ
खामोश हैं
आपस में कोई संवाद नहीं
दूरियां हैं इतनी कि पाटना है मुश्किल
फिर भी लांछन पे लांछन लगाकर
रिश्तों को लीले जा रहे
मुह बड़े हैं दिल छोटे
मनगढ़ंत, बेबुनियाद और बिल्कुल बकवास बातें कर करके
प्यार करने वाले दिलों को
बिना खून का एक कतरा टपकाये
चीरे जा रहे
ताज्जुब है और अफसोस भी
ऐसे लोग आजकल के सन्दर्भ में
कातिल भी नहीं कहला रहे।

मीनल

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