विलुप्त प्राय हमारा भविष्य

विलुप्त प्राय हमारा भविष्य

सुनकर आश्चर्य हो रहा है! परंतु यह वास्तविकता के काफ़ी नज़दीक है। पहले हमने सुना होगा की गिद्ध जैसे अनेक पक्षी एवं जानवर या तो विलुप्त हो गए हैं या विलुप्त प्राय है। परंतु हम इंसानो पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हमारी अगली पीढ़ी कलम कापी से दूर हो रही है। सब कुछ ऑनलाइन या टाइप करके हो जाता है। कवियों, लेखकों द्वारा नाटकों का लेखन एवं कथा मंचन भी विलुप्तप्राय है। गाँव में होने वाले नुक्कड नाटक तो करीब क़रीब विलुप्त हो चुके हैं। अगर यही स्थिति रही तो हमारा धार्मिक – सांस्कारिक अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। आज इ बुक, ऑनलाइन परीक्षा, लेखा जोखा सब कंप्युटर से है तो भविष्य में हमारी पीढ़ी शायद कलम कागज देख भी ना पाए। और इक लेखक की नज़र से कलम विलुप्त तो भविष्य विलुप्तप्राय ही है। वैसे मेरा मानना है कि ऑनलाइन लेखन हमे बहुत लोगों से जुड़ने का अवसर देता है पर हमे और अगली पीढ़ी को कलम से भी जुड़े रहना चाहिए तो हमे ऑफलाइन लेखन पद्धति का भी संरक्षण करना होगा।

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