चन्द्रग्रहण

चन्द्रग्रहण

चाँद कहे धरा से थोड़ा सा तो खिसक ले,
कर लूँ दीदार मैं भी अपने चमन का,
अब कुछ घुटन सी होने लगी है मन पर,
कहीं मैं होकर निढाल गिर ना जाऊँ ज़मीपर।

धरा कहे ज़रा ठहर तो,
इतनी भी क्या है जल्दी,
कुछ समय तो सब्र कर,
मन तेरा है बड़ा चंचल।

डकहे चाँद मेरे बिना तेरा जीवन है अधूरा,
कल्पना कर! ना रहा मैं तो क्या होगा?
सूर्य के ताप से जल जायेगा तेरा अस्तित्व,
ना कर हठ! अब ज़रा सा ही खिसक ले।

धरा कहे लो मान गई मैं तुम्हारा कहना,
अब ना करना कोई ग़लत काम,
जिसका पड़ेगा चुकाना बहुत बड़ा दाम,
मैं माँ हूँ रखना होता है सबका ध्यान।

चाँद कहे माँ तो माँ होती है देती सबको क्षमादान,
यूँ पीछे से ही सही पर देती सबको जीवनदान ,
मैं रहूँगा ऋणी तुम्हारा जीवनभर,
जो आज तुमने मुझे दिया जीवनदान।

धरा कहे चल पगले अब क्या रुलायेगा?
आजा अब काफ़ी हुई तेरी सजा,
ना जाने क्यों करता है शरारतें,
चाँद कहे धरा से थोड़ा सा ………………।

मौलिक रचना
नूतन गर्ग (दिल्ली )

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Nutan Garg

एम०ए०,बी०एड०,लेखिका,कवियित्रि, गरीब बच्चों को पढ़ाना।

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