वो नोट जो फटा था,
मेरी जेब में पड़ा था।
बैचेन मन उसका बड़ा,
देखूँ मैं सारा जहां।

ठुकराया गया ना जाने,
कितनी चौखटों से।
पर्तदर लिपटी हुई , ,,,
सहमी सी तन्हाई उसकी।

इक जरा सी खोंट थी,
सीने पे अनगिनत चोट थी।
तोड़ा मरोड़ा किसी ओर ने,
घृणा का भाव उसकी ओर था।।

चल गया इक दिन इत्तेफाक से,
भीड़ भरे उस बाजार में।
इस रोचक बदलाव से,
उत्साहित बड़ा ही मन था।

हाय री किस्मत
यथावत तिरस्कृत उसकी।
मध्यस्थता उत्तम नोटों के संग,
प्रत्येक को नागवार थी ।

वो था सगा मेरा पर,
किसी और का ना खास था।
देकर छलावा गैर को
नफ़े का सबको भान था।।

-नेहा अवस्थी मिश्रा

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