ज़मीं पर गिरी बारिश की पहली बूँद सा है वो
तन पर मलय की छुअन की पहली सिहरन सा है वो

सूखे पहाड़ पर गिरी बर्फ के पहले क़तरे सा है वो
साजन से रूठी हुई गोरी के पहले नखरे सा है वो

पतझड़ के बाद खिले पहले गुलाब सा है वो
सावन में धरती के हरे भरे लिबाज़ सा है वो

आँखों के सागर की तरह बेहिसाब सा है वो
आसमां में चमकते माहताब के शवाब सा है वो

हाँ ज़नाब… सही सुना आपने….
इश्क़ है वो बस इश्क़ है वो…….

आरती ‘अक्स’

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