एक विवाहिता जिसने विवाहित जीवन की शुरुआत में ही अपने सुहाग को खो दिया उसके मन के भाव

नैनो में सजाये थे कुछ ख्वाब
समय की ठोकर ने उन सपनो को चकनाचूर किया
ज़िंदगी ने ही मुझे वक़्त न दिया
कुछ सहेज लू कुछ समेट लू
कुछ बातो को दिल के कोने में समेट लू
क्यू अधर में छोड़ दिया
अभी तो किनारा था पूरा दरिया था बाकी
कुछ बाते कही कुछ थी बाकी
रौशनी गुम हो गयी
रह गयी काली रात बाकी
जीवन उम्मीदों की लौ से कब यादो का पिटारा बन गयी
अटखेलिया करती ज़िंदगी कब बेरंग हो ढल गयी
मेरी जीवन की कश्ती तो लहरों से टकराने से पहले ही गर्द में मिल गयी
जिन आँखो में थे सहेजे सुन्दर सपने
उन आँखो को आँचल से छुपाती हूँ
बहती अश्रुधारा से कुछ गम को भुलाती हूँ
बस बाट जोहती जाती हूँ
बस बाट जोहती जाती हूँ।

शालिनी जैन

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