बासों के जंगल

बासों के जंगल

वक्त बेरहम
एक मिसरी की डली को भी
तीखी लाल मिर्ची बना देता है
आत्मा लहूलुहान
फौलादी शरीर से लहू का एक कतरा न
टपके
जीवन बेजान
जाना पहचाना अंजान
नस नस पशेमान
हर आंसू बेईमान
हर मुस्कुराहट परेशान
पैरों में नश्तर से चुभे
दिल कापे
हाथों में झनझनाहट
घर से निकल न सके
किसी राह पे चल न सके
बासों के बेसुरे जंगल ही
अब तो अपने सपनों की मंजिल।

मीनल

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