कोई है होठों तक, बे-पर्दों में आया।
रातें भी पहचानें, जो ख्वाबों में आया।

बेला सा महके हैं, सारा तन-मन उसका,
धीरे-धीरे चुपके, जो साँसों में आया।

यादें आती हैं उस, मोती के गहनों की,
लेकर बरखा बूंदें, जो यादों में आया।

नादान नहीं है वो, अल्फाजों का सिकंदर,
बिन लाये जो मेरी, हर बातों में आया।

पहली बाली उसकी, मोहें हैं मन सबका,
पीला-पीला कुमकुम, जो सरसों में आया।

हर दिल का वो पक्का, जो मेरा यार कहीं
मेरा ग़म सुलझाने, जो लाखों में आया।

ओझल ना होने दूँ, ‘मैं’ नैनों में भर लूं,
खुश्बू बनकर गुलशन, जो तोह्फ़ों में आया।

Rishikant Rao Shikhare

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