डाकू कौन ?

वो जो बीहड़ में रहते थे ,

सब उनको डाकू कहते थे ।

शासन के अपराधी थे ,

दिल से मानवता वादी थे ।

जब सह न सके अन्याय बड़े ,

तब बीहड़ में वो कूद पड़े ।

ईमान – धरम के पक्के थे ,

अपनी ज़बान के सच्चे थे ।

जुल्म ओ सितम खुद पर ही सहे ,

कमजोरों के रक्षक ही रहे ।

जब राह  कोई न उन्हे दिखी ,

तब उठा बंदूक बने बागी ।

फिर शासन का अभियान चला ,

बिनोवा जी का मान रखा ।

आत्मसमर्पण डाकुओं ने किया,

चम्बल घाटी  को मुक्त किया ।

लेकिन मन में उठती बात कहीं ,

कहना चाहूँ  सबसे  मैं  यही ।

कि स्कूलों, ऑफिस, सड़कों

या बाजार ,गली ,चौराहों पर ,

हैं नोच-नोच…… खाने वाले

मानव रूपी……. गिद्ध सभी।

ईमान – धरम इनमें न कहीं ,

न ही   मानवता वादी   हैं ।

बीच  हमारे  छुपे  हुये

ये पक्के अवसरवादी हैं ।

लगे मुखौटे चेहरों पर

गिरगिट को मात दिये अक्सर

वस्त्र हैं तन पर श्वेत- धवल ,

भीतर मन में कीचड़ दल- दल ।

लूट-खसौट छीना-झपटी

की प्रबल हो रही परिपाटी ।

अब कौन बिनोवा बन आये,

आत्मसमर्पण इनका करवाये।

दस्यु से इनका कोई  मेल नहीं ,

वो इंसा थे,   ये इंसान नहीं ।

कल्पना मिश्रा

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