यह जो तुम मुह खोलती हो
तो तुम्हारे पेट में से कौन से साज
की आवाज का पिटारा बजता है
क्या कह रही हो
किसे क्या सुना रही हो
यह इंसान तो इंसानों की बोली ही नहीं
समझते
तुम नन्ही सी जान को क्या समझेंगे
यह परेशानियां पैदा करते हैं
उन्हें हल नहीं करते
तुम्हारी कोई समस्या गर है तो
उसे क्या सुलझायेंगे
तुम तो यह शहर
यह मकान छोड़कर
जंगलों में ही वापिस लौट जाओ
वहां पेड़ों पे आशियाने बनाओ
झरनों में नहाओ
नदियों के पानी से अपनी प्यास
बुझाओ
फल फूल दाने मकरंद खाओ
अपनी दुनिया वहीं
तलाशो
अपना आसमां वहीं तलाशो
इस बेदर्द जमाने से
तुम्हें ठोकर के सिवाए
कुछ और न मिलेगा
यह अपनों को तो पूछते नहीं
तुम पे जान कौन लुटायेगा
तुमसे मोहब्बत कौन करेगा
तुम्हें दिल में कौन पालेगा
तुम्हारी तरफ दोस्ती का हाथ
कौन बढ़ायेगा
तुम्हें पलकों पे बिठा झूला
कौन झुलायेगा
तुम्हारी कल्पना के चित्रों में
प्रेम के प्राकृतिक रंग कौन
भरेगा
तुम तो हो इनके लिये बिना काम की
बिल्कुल पराई
तुम्हें आलिंगनबद्ध करके
अपनों की तरह
इस स्वार्थी खुद के लिये भी परायों की दुनिया में
कौन अपनायेगा।

मीनल

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