एक से पचास

एक दो तीन चार पाँच छे सात,
गिनती ये मेरी प्रभु सुनो जग्गनाथ।
आठ नौ दस ग्यारह बारह तेरह,
तेरा हो  हाथ छूटे जन्मों का घेरा।
चौदह पंद्रह सोलह सत्रह अठारह उन्नीस,
हार भी ना मेरा प्रभु ना हीं मेरी जीत।
बीस इक्कीस बाइस तेईस चौबीस पच्चीस,
हरो दुख सारे प्रभु तू हीं मन मीत।
छब्बीस सताईस अठाइस उनतीस तीस इकतीस,
मिल न पाऊँ तुझसे मैं मन में है टीस।
बत्तीस तैतीस चौतीस पैंतीस छत्तीस सैंतीस,
शुष्क हृदय है प्रभु तु हीं  इसे सींच।
अड़तीस उनचालीस चालीस इकतालीस बयालीस तैतालिस,
मन मे बसों तु ही बस इतनी  सी ख़्वाहिश।
चौवालीस, पैतालीस, छियालीस, सैतालिस, अड़तालीस ,उन्नचास,
एक से शुरू है प्रभु तू हीं है पचास।

अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

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AJAY AMITABH SUMAN

जीवन में बहुत सारी घटनाएँ ऐसी घटती है जो मेरे ह्रदय के आंदोलित करती है. फिर चाहे ये प्रेम हो , क्रोध हो , क्लेश हो , ईर्ष्या हो, आनन्द हो , दुःख हो . सुख हो, विश्वास हो , भय हो, शंका हो , प्रसंशा हो इत्यादि, ये सारी घटनाएं यदा कदा मुझे आंतरिक रूप से उद्वेलित करती है. मै बहिर्मुखी स्वाभाव का हूँ और ज्यादातर मौकों पर अपने भावों का संप्रेषण कर हीं देता हूँ. फिर भी बहुत सारे मुद्दे या मौके ऐसे होते है जहाँ का भावो का संप्रेषण नहीं होता या यूँ कहें कि हो नहीं पाता . यहाँ पे मेरी लेखनी मेरा साथ निभाती है और मेरे ह्रदय ही बेचैनी को जमाने तक लाने में सेतु का कार्य करती है.

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