किन्नर-प्रभु की संतान

 

भेद नहीं कुछ तुझमें मुझमें,
हूँ प्रभु की मैं भी सन्तान ।
कुदरत की इक भिन्न मैं रचना,
हैं दिल में कई अरमान ।।
जन्म दिया था तूने मुझको,
पाकर शिक्षा बढ़ाता तेरा मान।
त्याग किया तूने क्यों मेरा,
अब तक हूँ बहुत हैरान ।।
उपेक्षित वर्ग बना दिया हमारा,
नर-नारी से पहले,मैं हूं इन्सान ।
हम सब कृति है ईश्वर की,
क्युं बांटा भेदभाव का ज्ञान ।।
साथ अपनों का छूट गया,
क्युं दिखाई थी झूठी शान ।
मैं था इक अंश तुम्हारा ही,
निश्छल थी मेरी मुस्कान ।।
तरसता था मेरा भी मन,
पाने को अपनापन और सम्मान ।
ऐसा क्या अपराध किया था,
संघर्ष कर पायी नव पहचान ।।

डॉ.नेहा अवस्थी मिश्रा

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Golden Ray A Sunahri

-होम्योपैथिक चिकित्सक -रेकी मास्टर -कविता लेखन

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