अभी थे
अभी नहीं हैं
यही जीवन की कहानी है
निरन्तर चलते रहना ही इसकी
रवानी है
जिनका अस्तित्व था
वो शेष नहीं
जो गूढ़ है
वो है बाकी
जो दृश्य था
वो खो जाता है
जो अदृश्य था
वो उभर आता है
जीवित से अजीवित चीजों का मोल है
ज्यादा
उनका जीवन है अधिक
उनकी अतिजीविता है अधिक
वो स्थाई हैं अधिक
अस्थाई है मनुष्य
अप्राकृतिक है मनुष्य
असंतुलित है मनुष्य
अव्यवहारिक है मनुष्य
अहंकारी है मनुष्य
अबोध है मनुष्य
प्राकृतिक आपदाओं को भी झेलने की
ताकत उसमें नहीं
फिर किस बात का गुमान है
जीवन रहते
खुद जियो
औरों को भी जीने दो की
विचारधारा पे
वो आखिरकार क्यों नहीं कायम है।

मीनल

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