वफा के खरीदार

सूखे की मार है
रस की फुहार है
बाहर की सुंदरता
भीतर से खोखली
गिरी हुई दीवार है
सजाता है हुस्न खुद को दुल्हन की
तरह
बाजार में खुद को बेचने के
लिये
पीछे छूट जाती है खूंटे में अटकी
धानी चुनर
खुद से खुद का हाथ
छुड़ाते हुए
जिस्म की लौ से
हर पल एक मशाल जलती है
अपने दिल के रिश्तों का
लहू पीते हुए
फिर कोई चिंगारी भेंट चढ़ती है
अपनेपन का विश्वास खोते हुए
खुद से खुद की दूरी तय नहीं होती
न रास्ते में बिछे फूल
न मंजिलों पे खिलते चमन ही
दिखते हैं
परेशान होता है जब राहगीर
उसे रहने को घर कब मिलते हैं
यह दुनिया तो रंगीला
चमचमाता एक बाजार है
यहां सब कुछ बिकता है
वफा के खरीदार कहां
मिलते हैं।

मीनल

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