देखो यह आसमां में
किसी घटते हुए चाँद की तरह
जीवन भी हाथ में न आया
जितना मैंने इसे पकड़ना चाहा
अपने से उसे उतना ही दूर पाया
अन्ततः जब कुछ खो जाता है और
हम उसे वापिस पाना चाहते हैं तो
हम इस दुनिया में रहते हुए भी
सच को स्वीकारने से हिचकिचाने लगते हैं और
कल्पनाओं की एक दुनिया बना
उसमें विचरने लगते हैं
जो हमसे छूट गया
जो बिछड़ गया
उसे ढूंढकर
पुनः पाने लगते हैं पर
वो फिर असत्य होता है
एक मिथ्या होती है
बस ऐसे ही खेलते रहते है
तमाशे करते रहते हैं
सब कुछ जानते हुए भी
सच को झुठलाने लगते हैं
अपना दिल बहलाने लगते हैं
और फिर किसी रोज
किसी पल सबको
अलविदा कह
इस दुनिया से किसी दूसरी
अनदेखी दुनिया की तरफ
जाने लगते हैं।

मीनल

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