खंडहर

खण्डहर”

एक दिन यूँ ही
एक सुनसान दुपहरी में
जब काटने को दौड़ता था सूनापन
मेरी नजर मिली एक उदास बूढ़े घर से,,
उस घर की बूढ़ी आँखे
देख रही थीं मुझे इतनी बेकली से
ज्यों सदियों से ढूँढती हो
कोई मुझ सा श्रोता।।
मैंने बस यूँ ही जरा
कुछ गौर से क्या देख लीं
उस घर की दरारें,,
फफक कर रो पड़ा वो बूढ़ा घर
हर दरार से रिसने लगे आँसू।।
उम्र,अकेलेपन और मौसम की मार से
चटकने लगी थीं उस घर की दीवालें।।
दीवालों ने सालों से जब्त कर रखी थीं अनगिनत
कही-अनकही भली-बुरी बातें।।
उस घर के पड़ौसी थे
कई बूढ़े जर्जर खंडहर।।
जो बेचैनी से ढूँढते थे बस एक जोड़ी कान,,
सहेजी रखी थी उनके पास
सारी उम्र की दास्तान।।
जाने कितनी कहानियों,गमों, हादसों के चश्मदीद गवाह थे वो
कभी जो मिल जातीं उन्हें कोई उत्सुक आँखे
झट से सुनाने लगते अपनी जवानी के किस्से।।
उन्हें आज भी याद था
अपनी छटी का दिन
ज्यों का त्यों।।
घर की दीवालों पर दर्ज थी अभी
जाने कितने हाथों से चली
अलग-अलग रंगों की कुचियाँ
नववधू की मंगलछाप
नन्हों के हस्ताक्षर।।
घर की घुनी किवाड़ों को छूते ही
यूँ लगा ज्योँ थाम लिए हों कोई बूढ़े हाथ,,
कुछ यूँ ही कंपकंपा उठी उस घर की किवाड़े।।
जर्जर खिड़कियों पर अब भी उभरे थे कुछ अल्हड़ प्रीत के निशान,,
मेरी नजर मिलते ही वो खंडहर सुनाने लगा अपनी दर्द भरी दास्तान।।
ज्यों बुआ करती है किसी शिशु का छटी पूजन
कुछ यूँ ही एक दिन घर की बेटी ने नींव पूजी थी हमारी।।
ज्यों शिशु को नजरिया पहना,डिठौना लगा सब लेते हैं बलैया
कुछ-कुछ ऐसे ही हल्दी चावल से पूज स्वास्तिक बना
किये गए थे कई सारे टोटके
हमें बुरी नजर से बचाने को।।
ज्यों सभी देते हैं आशीष जुग-जुग जीवे लाल,,
कुछ यूँ ही चिरंजीवी होने के साथ ही की गयी थी
हमारे शीघ्र पूर्ण होने की कामना।।
गृहप्रवेश ऐसा था ज्योँ हो किसी लाड़ले की पहली वर्षगाँठ।।
जिस प्यार से सब चुनते हैं लाड़ले की पोशाक
कुछ यूँ ही घर की बेटियों ने
पहनाये थे खिड़की दरवाजों पर चमकीले सुंदर कपड़े।।
किसी दूल्हे के सेहरे सा सजाया गया था
मुख्य दरवाजे पर बन्दनवार
औऱ मोती की लड़ियाँ।।
मुख्य द्वार की सबसे सुंदर नक्कासी पर
शिशु के डिठौने सा सोहता था नजरौटा ।।
हम त्योहारों पर दुल्हन सा निखर उठते थे।
हर दीवाली किया जाता था
हमारा सोलह श्रृंगार
कोना-कोना दमक उठता था हमारा।।
हर त्योहार आँगन में सजती थीं तरह-तरह की रंगोलियाँ।।
धीरे-धीरे उम्र बढ़ने लगी हमारी
कम हो गया हमारे प्रति घरवालों का प्रेम।।
बन्द हो गया त्योहारों पर हमारा बनाव श्रृंगार।।
धीरे-धीरे सबका मन उचटने लगा हमसे
बदलते समय के साथ हम पुराने हो चले थे।
सारे बच्चे बड़े हो गये,,
घर के पक्षी दाने पानी की तलाश में दूर चले गए।।
घर की चिड़ियां उड़ा दी गईं
दूसरे पेड़ो पर,,
उनके उड़ते ही थम गईं घर की खुशियां।।
समय बदला बदल गयीं घरवालों की चाल-ढाल।।
नये बच्चों ने, नये घरों में
बसा ली नई गृहस्थी।।
सबने मुँह मोड़ लिया हमसे
हम उपेक्षा से टूटकर बिखरने लगे,,
हमारे मालिक बूढ़े हुए और ढह गए,,
कोनों-कोनों में पसर गया सन्नाटा।।
दीमकों ने खोखला कर दिया हमारी जड़ो को,,
खोखली होने लगीं घर की दहलीजें।
धीरे-धीरे दरकने लगी हमारी दीवालें,,
अब टूटी जर्जर खिड़कियां
उखड़ी चटकी सीलन भरी दीवालें लिए
लड़खड़ाते हुये हम खड़े रह गए,,
बस अकेले ,बूढ़े ,जर्जर खंडहर
ठहने की प्रतीक्षा में…

मीनाक्षी वशिष्ठ

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