क्यों उदास है? क्या हुआ
जो कोई ना तेरे साथ है
पथिक चिंता मत कर
तुझे कैसा डर
उठ राह पर निकल पड़ मंजिल मिल ही जाएगी

मंजिल दूर तो सही
तू हारा तो नहीं है
तन से हारा हो तो क्या
मन से हारा तो नहीं है
मन से हारे ना इंसान तो मंजिल मिल ही जाएगी

अकेले इस कठिन राह पर चलना
क्या किसी सम्मान से कम है
कठिनाइयों के यह अनुभव
क्या किसी मिसाल से कम है
यह जरूरी है इन्हें भी साथ ले चल मंजिल मिल ही जाएगी

दिन रात यह यूं ही गुजरते हैं
समय देकर समय ले चलते हैं
कितने दोस्त मिले रहा में
सब दिन रात से गुजर गए
चलता रह मुकम्मल सुबह के लिए मंजिल मिल ही जाएगी

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4 Comments

  1. आशा है आपको ये मेरी कविता पसंद आएगी आपको ये कैसी लगी कमैंट्स करके जरुरत बताइये और कोई कमी हो तो उसका भी मूल्यांकन करें

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  2. ramshran panchal

    very nice poime

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  3. Vivek fauzdar

    Wow… Supprb stanza keep continue another poetry…. Best of luck

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  4. Himanshu Soni

    Kya Baat He Bohat Badiya Bohat Badiya

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