ईश्वर को रक्षक माना जाता
ईश्वर को तो नहीं देखा हमने
पर रक्षक वीर सपूतों को देखा है

देते हैं लहू जो अपना, धरती माँ की सेवा में
जंग ऐ मैदान में ये शेर, दुश्मन से लड़ते हैं
दुश्मन के खतरों से, ये हमारी रक्षा करते हैं

कुछ खाश दिनों के जैसे (15अगस्त,26 जनवरी, शहीद दिवस)
क्यों न हम इन वीरों का प्रतिदिन सम्मान करें
ईश्वर की तरह प्रतिदिन पूजन और ध्यान करें
हर दिन हम उनकी दी कुर्बानी को याद करें

वो रक्षक कहते हैं, हे! मात्रभूमि
तेरी खातिर अपने लहू का अंतिम कतरा बहा देंगे
पर न लगने देंगे कोई दाग तेरे दामन में
जो बढ़े नापाक पैर सरजमीं पर, वो हस्ती मिटा देंगे

करता सुभाष सौ बार नमन उन वीरों को
जो खुद को जोड़े हैं रक्षा की इन जंजीरों से
सहते हैं सितम, जाड़ा, गर्मी हो या बरसात
देते हमको चैन सुकून का दिन और रात

धन्य वो मात पिता, भाई,बहना और भार्या
जो इस देश की रक्षा के खातिर,
हँसते हँसते अपना सर्वस्त्र लुटाते हैं
नमन करूँ मैं उनको बारम्बार शीश नवाऊँ

प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीदों की
केवल अंतिम एक ही आशा होती है
बने कफन तिरंगा ये ही अभिलाषा होती है
मैं देश के उन वीरों को शीश नवाता हूँ
ऐ वीर तेरे चरणों में मैं अपना शीश झुकाता हूँ

सुबोध उर्फ़ सुभाष

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