मीठी चाहत

मीठी चाहत

जिन्दगी नीम के पत्तों की तरह
कड़वी हो रही है
मैं आशंकाओं से
भरी हूं
दिल में अजब सी घबराहट हो रही है
कांटों से घिरी हूं मैं
विपदाओं के पहाड़ों तले दबी हूं मैं
फूलों के बीच रहने की चाहत हो
रही है
मैं बहुत परेशान हूं
दुखी हूं
गले से कोई बोल नहीं फूट रहा
मैं मीठा बोलना चाह रही हूं
मीठे लोगों के बीच रहना चाह रही हूं
उनकी मिठास में घुलना
चाह रही हूं
मीठी रस भरी बातों में सराबोर होना
चाह रही हूं
मीठी चाशनी की अपनत्व भरी फुहारों सी बारिश में भीगना
चाह रही हूं
सारे गम भुला कर
कुहु कुहु अमुवा की डाली पे
मीठी कोयल की वाणी सी
पत्तों की ओट से बाहर निकलकर
सबके साथ मिलकर
उनके सुर में सुर मिलाकर
कूकना चाह रही हूं।

मीनल

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