एक तुम ही तो थे
जिसके दीदार से सारे गिले शिकवे
हो जाते थे गुम..
जिसके इश्क़ की कानों में हर पल
बजती रहती थी धुन..

एक तुम ही तो थे
साँसें चलती थी जिसका नाम सुन
आंखें चमकती थी जिसके ख्वाब बुन
मैं ‘मैं’ न रही जिसका होने के बाद
ज़िन्दगी इतराती थी जिसे हमसफ़र चुन..

एक तुम ही तो थे
जिसके साथ बुढ़ापे की एक शाम दिल
ढलता सूरज देखना चाहता था..
जिसके कंधे के सहारे जीवन की डगर पर
लाठी लेकर चलना चाहता था..

एक तुम ही तो थे
जिसको हर पल सब कुछ
मैं बनाना चाहती थी..
जिसका हर पल सब कुछ
मैं बनना चाहती थी… @

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