कोरा कागज

कोरा कागज

कोरा कागज पूछ रहा है

हो इतने खामोश जो
क्या लफ़्ज़ों में कुछ छूट रहा है

है जमी यादों पर बर्फ की तह
मुझको न अब कुछ सूझ रहा है

छा गया है दर्द-ओ-ग़म का गुबार
अन्तर्मन में जैसे कुछ टूट रहा है

जिनको ता-उमर हम सँजोते रहे
उन ख्वाबों को कोई लूट रहा है

कोरा कागज पूछ रहा है
हो क़लम में जो इतना दर्द लिए
क्या कोई नासूर फूट रहा है.

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Aarti Human

अब हाल-ए-दिल ना पूँछ कि ताब-ए-बयाँ कहाँ अब मेहरबान ना हो कि जरूरत ना रही....

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