आ घर लौट चलें

आ घर लौट चलें

डूबता सूरज भी है
कह रहा
कि आ घर लौट चलें
है तिनकों का आशियाना
पर चल आ घर लौट चलें
शाम के कुछ लम्हे गुजारेंगे
अपनों के साथ
रात को देखेंगे ख्वाब
चाँद को रखकर अपने तकिये के
पास
सुबह आंख खुलेगी
तो छोड़ देंगे घर की दहलीज
बितायेंगे पूरा दिन कड़ी धूप में
मेहनत मशक्कत के साथ
शाम थकहार के फिर घर
लौटेंगे
एक डूबती नारंगी शाम के साथ
आंखों में भरकर कुछ सुनहरी ख्वाब
घर से अपनों के दिल तक
पहुँचने के सीधे सपाट रास्ते
खुले द्वार
संगमरमर के सुकून भरे मोहब्बत में नहाये इजहार
रेशमी ख्यालों में लिपटे जज्बात
चाँद की चाँदनी से सराबोर मखमली अहसास।

मीनल

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