चंपई कली

चंपई कली

एक चंपई कली
रंग चुराती फिजा के
खुशबू बिखेरती जहां में
धूप में खिलती
सुबह से शाम तलक महकती
खिलखिलाती देखकर उसे
जो गुजर जाता पास से
चाँदनी रात में सो जाती
ओस की बूंद पड़े तो सिहर के
जाग जाती
पाकर खुद को अकेला
कुछ पल तो डर के सहम जाती
तेज बारिश की बौछारों की
आंधियों की
जंगली हवाओं के थपेड़ों की पड़ जाती जब आदत
तो थककर के सो जाती
एक बुरे स्वप्न की तरह सबकुछ भुलाकर
बर्बादियों का जश्न मनाती।

मीनल

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