अबोध

अबोध

मैं धंस रही थी
जमीन में
बिना बात, बेवजह
मन को उठाने का कर रही थी
भरसक प्रयत्न
पर न पानियों में बह रही थी
न धरातल पे चल रही थी
न ही हवा में तैर रही थी
पानियों के दर्पण में जो देखती थी
अपनी छवि
तो खुद को पहचान नहीं पाती थी
खो जाती थी एक लहर की तरह
न जाने कहाँ
किनारों के आंचल को मैं खुद के
सिर पे आसमान के आशीष की तरह
ओढ़ नहीं पाती थी
बचती बचाती कसमसाती डांवाडोल
थी
अपने जीवन की दौड़ से मैं
अनभिज्ञ थी
सच पूछो तो मैं सबसे
अभिन्न
चरित्र से अबोध थी
एक मछली की तरह जल में ही
कैद थी
आशाओं के समुंदर गहरे थे
सपनों के आकाश ऊंचे
पर जीवन की विषम परिस्थितियों की
दिशा उल्टी।

मीनल

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