एकांत

एकांत

सोचती हूं
पल दो पल
दुनिया की हलचल
से दूर
प्रकृति की शांत गोद में
एकांत में
चैन की सांस ले लूं
इन पेड़ों से सीखूं
मन को स्थिर रखकर
जीवन की गति बनाये रखना
इन जमीन पे पड़े पत्तों को देखूं
और सोचूं कैसे
बिना विचलित हुए
फिर से मिट्टी में मिलकर
खाद्य पदार्थ बनकर
संचालित करते हैं किसी बीज की
जीवन यात्रा
इन हवाओं संग उडूँ
जानूं कैसे बहती रहती हैं
चहु दिशा सुगंध फैलाती हैं
बिना स्वार्थ के
इस विशाल आसमां को देखो
कैसे टुकड़ों में झांक लेता है
दिख जाता है घने बन में
इस कर्मभूमि की मिट्टी को चूम
लूं
कैसे मार्ग प्रशस्त करती है मेरा
जब कभी समा जाता है
अंधकार घनेरा मेरे तन मन में।

मीनल

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