एकरूपी जीवन दर्शन

एकरूपी जीवन दर्शन

कुदरत की रोशनी तुम्हारी रूह को

छूती है

मुझे नहीं

देखो कुछ भी करो

यह भेदभाव मत करो

कायनात के सारे रंग तुमने

बटोर लिए

सारी रोशनी तुमने चुरा ली

सारे आसमां के रूप तुमने

समेट लिए

मेरे पास क्या छोड़ा

बस यह रेतीला, शुष्क, बंजर मरुस्थल

जहाँ मैं एकाकी जीवन जी रही

एक सूखे पेड़ के तने सी

स्थिर खड़ी

न फूल, न पत्ते, न ही मेरे हिस्से 

आई कोई बहार

बस मुझे जीने के लिए

एक जीवन दे दिया

उसे एक खाली कैनवास

सा छोड़ दिया

किसी भी कूची से कोई रंग ही

न भरा

पानी के पारदर्शी जल से भी

उसकी प्यास का गला नहीं

तरा

यह उसपे कैसा करम किया

उसे न अमृतपान कराया

न ही विष का प्याला पिलाया

न कोई आशीर्वाद

न कोई प्रसाद

यह एकरूपी जीवन दर्शन का

हे भगवन कैसा उपहार।

मीनल

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu