आत्मसम्मोहन

आत्मसम्मोहन

तितली सी

पंख फैलाये

उड़ रही

बादलों के द्वार

यह आत्मसम्मोहन ले जायेगा

मुझे

आकांक्षाओं के लहराते बवंडरों के

पार

मन में झिलमिलाती एक उम्मीद की

किरण रख

जमीं पे भी उतरूंगी

कलियों की मखमली रेशों से बुना 

परिंदों के परों सा कोमल

आशाओं की नैय्या सा बहता

सपनों की नीली जामुनी तरंगों सा लहराता

हरी दूब की रेशमी खाल पे एक

दरिया रख।

मीनल

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